भारत के प्रमुख सामरिक थिंक-टैंक Centre for Land Warfare Studies (CLAWS) ने मई 2026 में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन में चेतावनी दी है कि भविष्य के किसी बड़े संघर्ष में भारत पर प्रतिदिन 1500 से 2000 या उससे अधिक ड्रोन के समन्वित हमले हो सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार ऐसे हमले भारत की वायु रक्षा, कमांड एवं कंट्रोल नेटवर्क और सैन्य प्रतिष्ठानों को अभूतपूर्व दबाव में डाल सकते हैं।
यह सिर्फ एक सैन्य अध्ययन नहीं है। यह भविष्य के युद्ध की झलक है।
ड्रोन युद्ध का नया युग :
यदि हम पिछले दस वर्षों को देखें तो ड्रोन तकनीक ने युद्ध की प्रकृति बदल दी है। Russia–Ukraine War ने दुनिया को दिखा दिया कि कुछ हजार डॉलर का ड्रोन लाखों डॉलर के टैंक को नष्ट कर सकता है।
CLAWS के अनुसार भविष्य के युद्ध में दुश्मन केवल लड़ाकू विमानों या मिसाइलों पर निर्भर नहीं रहेगा। वह हजारों ड्रोन, स्वार्म (झुंड) तकनीक, लुटरिंग म्यूनिशन (आत्मघाती ड्रोन), इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का संयुक्त उपयोग करेगा।
यानी युद्ध अब केवल "कितने सैनिक हैं" का प्रश्न नहीं रहेगा, बल्कि "कितने बुद्धिमान ड्रोन हैं" का प्रश्न बन जाएगा।
CLAWS की सबसे बड़ी चेतावनी :
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि भारत को एक साथ कई मोर्चों पर संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है।
विश्लेषण के अनुसार:
• प्रतिदिन 1500–2000 या उससे अधिक ड्रोन हमले संभव हैं।
• हमले कई दिशाओं से एक साथ हो सकते हैं।
• ड्रोन सैन्य अड्डों, रडारों, एयरबेसों, कमांड सेंटरों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को निशाना बना सकते हैं।
• बड़ी संख्या में आने वाले ड्रोन पारंपरिक वायु रक्षा प्रणालियों को संतृप्त (overwhelm) कर सकते हैं।
यह अनुमान काल्पनिक नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर के संघर्षों ने दिखाया है कि ड्रोन निर्माण और संचालन की लागत लगातार कम हो रही है जबकि उनकी मारक क्षमता बढ़ रही है।
चीन और पाकिस्तान से दोहरा खतरा :
CLAWS अध्ययन का केंद्रीय तर्क यह है कि भारत को संभावित रूप से दो-फ्रंट या मल्टी-फ्रंट परिदृश्य के लिए तैयारी करनी होगी। रिपोर्ट में यह आशंका व्यक्त की गई है कि भविष्य में राज्य और गैर-राज्य दोनों प्रकार के विरोधी ड्रोन तकनीक का बड़े पैमाने पर उपयोग कर सकते हैं।
चीन विश्व की सबसे बड़ी ड्रोन निर्माण क्षमताओं में से एक रखता है। उसके पास सैन्य और नागरिक दोनों प्रकार के उन्नत ड्रोन हैं।
दूसरी ओर पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में ड्रोन आधारित निगरानी, हथियार आपूर्ति और सीमा पार गतिविधियों में लगातार निवेश किया है।
यदि किसी संकट की स्थिति में दोनों दिशाओं से ड्रोन गतिविधि बढ़ती है तो भारतीय सुरक्षा बलों को अभूतपूर्व दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
2000 ड्रोन का हमला वास्तव में कैसा दिखेगा? :
कल्पना कीजिए।
रात के दो बजे हैं।
सीमा के निकट स्थित एक एयरबेस सामान्य गतिविधियों में व्यस्त है। अचानक रडार स्क्रीन पर सैकड़ों छोटे लक्ष्य दिखाई देने लगते हैं।
कुछ ही मिनटों में संख्या हजार के पार पहुँच जाती है।
इनमें से कुछ निगरानी ड्रोन हैं।
कुछ आत्मघाती ड्रोन हैं।
कुछ इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग कर रहे हैं।
कुछ नकली लक्ष्य हैं जिनका उद्देश्य वायु रक्षा प्रणाली को भ्रमित करना है।
कुछ गोला-बारूद लेकर महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिष्ठानों की ओर बढ़ रहे हैं।
अब समस्या यह है कि प्रत्येक ड्रोन को मार गिराने के लिए यदि लाखों रुपये की मिसाइल प्रयोग करनी पड़े तो आर्थिक रूप से रक्षा करना असंभव हो जाएगा।
यही आधुनिक ड्रोन युद्ध की सबसे बड़ी चुनौती है।
ड्रोन स्वार्म: जब मशीनें झुंड बनाकर हमला करती हैं :
CLAWS रिपोर्ट विशेष रूप से "स्वार्म ड्रोन" खतरे पर ध्यान देती है। स्वार्म का अर्थ है ऐसे ड्रोन जो एक-दूसरे से संवाद कर सकते हैं और सामूहिक निर्णय ले सकते हैं।
यदि एक ड्रोन नष्ट हो जाए तो बाकी अपने मार्ग बदल लेते हैं।
यदि किसी क्षेत्र में जैमिंग हो तो समूह दूसरे मार्ग से आगे बढ़ सकता है।
यदि किसी लक्ष्य की पहचान हो जाए तो पूरा झुंड उसी दिशा में केंद्रित हो सकता है।
युद्ध के इतिहास में पहली बार हजारों छोटे रोबोटिक प्लेटफॉर्म एक साथ युद्ध लड़ सकते हैं।
पारंपरिक वायु रक्षा क्यों पर्याप्त नहीं? :
भारत के पास मजबूत वायु रक्षा प्रणालियाँ हैं। लेकिन अधिकांश प्रणालियाँ विमान, हेलीकॉप्टर या मिसाइल जैसे बड़े लक्ष्यों को ध्यान में रखकर बनाई गई थीं।
ड्रोन एक अलग समस्या हैं:
• वे बहुत छोटे होते हैं।
• उनकी रडार पहचान कठिन होती है।
• वे कम ऊँचाई पर उड़ सकते हैं।
• वे दिशा अचानक बदल सकते हैं।
• वे बड़ी संख्या में आते हैं।
यानी चुनौती केवल ड्रोन को देखना नहीं बल्कि हजारों ड्रोन को एक साथ पहचानना और निष्क्रिय करना है।
भारत के लिए सबसे संवेदनशील लक्ष्य :
यदि बड़े पैमाने पर ड्रोन हमला होता है तो संभावित लक्ष्य हो सकते हैं:
1. एयरबेस
2. रडार स्टेशन
3. मिसाइल भंडार
4. बिजली संयंत्र
5. तेल रिफाइनरी
6. संचार नेटवर्क
7. सैन्य कमांड केंद्र
8. परिवहन अवसंरचना
इनमें से कई स्थान देश की सामरिक क्षमता की रीढ़ हैं।
एक बड़े मिसाइल हमले की तुलना में हजारों छोटे ड्रोन लगातार नुकसान पहुँचा सकते हैं।
क्या भारत तैयार है? :
यह प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण है।
अच्छी खबर यह है कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीकों में महत्वपूर्ण प्रगति की है।
CLAWS के अन्य विश्लेषणों के अनुसार भारत ने आयातित ड्रोन पर निर्भरता कम करने और स्वदेशी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। देश में ड्रोन निर्माण, अनुसंधान और नवाचार तेजी से बढ़ रहे हैं।
भारत के पास अब:
• स्वदेशी ड्रोन कार्यक्रम
• एंटी-ड्रोन सिस्टम
• इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताएँ
• लेजर आधारित प्रौद्योगिकी पर शोध
• उन्नत रडार नेटवर्क
जैसी क्षमताएँ विकसित हो रही हैं।
लेकिन CLAWS का तर्क है कि खतरे का पैमाना इतना बड़ा है कि मौजूदा प्रयासों को और तेज करना होगा।
भविष्य का समाधान: Integrated Counter-UAS System :
रिपोर्ट एक समेकित Counter-UAS (Counter Unmanned Aerial Systems) ढाँचे की आवश्यकता पर बल देती है।
इसमें शामिल होंगे:
1. उन्नत सेंसर
ऐसे रडार और सेंसर जो छोटे ड्रोन को पहचान सकें।
2. इलेक्ट्रॉनिक युद्ध
ड्रोन के नियंत्रण और GPS संकेतों को बाधित करना।
3. हार्ड-किल सिस्टम
लेजर, माइक्रोवेव हथियार और तेज प्रतिक्रिया वाली वायु रक्षा प्रणाली।
4. Battle Management Command and Control
एकीकृत कमांड नेटवर्क जो हजारों लक्ष्यों को वास्तविक समय में ट्रैक कर सके।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका :
भविष्य के ड्रोन युद्ध में मनुष्य अकेले निर्णय नहीं ले पाएगा।
यदि 2000 ड्रोन एक साथ हमला करें तो हर लक्ष्य का विश्लेषण करना मानवीय रूप से असंभव होगा।
इसलिए AI आधारित प्रणालियाँ:
• खतरे की प्राथमिकता तय करेंगी
• ड्रोन वर्गीकृत करेंगी
• इंटरसेप्टर आवंटित करेंगी
• प्रतिक्रिया समय कम करेंगी
ड्रोन युद्ध अंततः मशीन बनाम मशीन संघर्ष में बदल सकता है।
आर्थिक युद्ध का नया रूप :
ड्रोन केवल सैन्य हथियार नहीं हैं।
वे आर्थिक हथियार भी हैं।
यदि 20,000 रुपये का ड्रोन किसी करोड़ों रुपये की सुविधा को नुकसान पहुँचा दे तो हमलावर को भारी लाभ मिलता है।
इसे "Cost Imposition Problem" कहा जाता है।
यही कारण है कि सस्ते एंटी-ड्रोन उपाय विकसित करना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना महंगे हथियार खरीदना।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद के सबक :
हाल के सुरक्षा विमर्श में ड्रोन और स्टैंड-ऑफ हथियारों का महत्व बढ़ा है। CLAWS के कई विश्लेषणों ने संकेत दिया है कि भविष्य के संघर्षों में लंबी दूरी से सटीक प्रहार और मानव रहित प्रणालियाँ निर्णायक भूमिका निभाएँगी।
इसका अर्थ है कि भारत को केवल प्रतिक्रिया नहीं बल्कि सक्रिय तैयारी करनी होगी।
संजय सक्सैना, वरिष्ठ विश्लेषक एवं विचारक : आने वाला युद्ध कैसा होगा?
CLAWS की रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यह नहीं है कि भारत पर कल 2000 ड्रोन हमला होने वाला है।
संदेश इससे कहीं अधिक गहरा है।
यह रिपोर्ट कहती है कि युद्ध की प्रकृति बदल चुकी है।
भविष्य के युद्ध में:
• टैंक होंगे, लेकिन ड्रोन भी होंगे।
• मिसाइलें होंगी, लेकिन AI भी होगा।
• सैनिक होंगे, लेकिन स्वायत्त मशीनें भी होंगी।
• सीमाएँ होंगी, लेकिन साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध भी होगा।
भारत के सामने चुनौती केवल ड्रोन खरीदने की नहीं है।
चुनौती है एक ऐसे सुरक्षा तंत्र का निर्माण करना जो हजारों ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक हमलों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित युद्ध के युग में भी प्रभावी बना रहे।
CLAWS की चेतावनी वास्तव में भविष्य की घंटी है। जो देश आज इस चेतावनी को समझेंगे, वही कल के युद्धक्षेत्र में सुरक्षित रहेंगे। और जो इसे नज़रअंदाज़ करेंगे, वे शायद तब जागेंगे जब आकाश में हजारों ड्रोन पहले से मंडरा रहे होंगे।