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Friday, April 24, 2026

News Desk / News Delhi /April 23, 2026

मनुष्य के जीवन में यदि किसी का स्थान सर्वोपरि है, तो वह ‘माँ’ है। लेखिका अर्चना कोचर की रचना “माँ – रूह से रूह तक” मातृत्व के इसी अनंत, आत्मिक और गहरे स्वरूप को बेहद संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है।

कला-साहित्य / “माँ – रूह से रूह तक” : मातृत्व की आत्मिक गहराई को उजागर करती अर्चना कोचर की भावपूर्ण रचना

अर्चना कोचर की यह रचना माँ के बहुआयामी स्वरूप को सामने लाती है, जिसमें ममता, त्याग, समर्पण और आत्मिक जुड़ाव का अद्भुत संगम दिखाई देता है। ‘माँ’—यह एक छोटा-सा शब्द अपने भीतर पूरे ब्रह्मांड को समेटे हुए है। उसके तप, त्याग, अर्पण और समर्पण में पवित्र भावनाओं का सतत प्रवाह होता है।

रचना में माँ को उस शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है, जो ईंट-पत्थरों के मकान को स्नेह, संस्कार और सुरक्षा की नींव से सींचकर घर बनाती है। गर्भावस्था के दौरान वह अपने भीतर धड़कती नन्हीं धड़कनों के साथ एक अनोखा रिश्ता स्थापित करती है और सृष्टि के विस्तार के लिए स्वयं को सीमित करती जाती है।

यह रचना केवल मातृत्व का गुणगान नहीं करती, बल्कि उस अदृश्य और अनंत संबंध को समझने का प्रयास करती है, जो शरीर, समय और परिस्थितियों से परे जाकर आत्मा से आत्मा को जोड़ता है। इसमें उस भावनात्मक यात्रा का वर्णन है, जिसमें एक स्त्री ‘औरत’ से ‘माँ’ बनते हुए त्याग की प्रतिमूर्ति बन जाती है। वह बाहर से कठोर दिखाई दे सकती है, लेकिन भीतर से ममता की नमी से भरी और संवेदनशील होती है।

लेखिका ने यह भी रेखांकित किया है कि माँ अपने बच्चों के हितों को सर्वोपरि रखते हुए धीरे-धीरे अपने अस्तित्व को पीछे छोड़ देती है। वह अपने लिए सोचना तक भूल जाती है, यही कारण है कि माँ को ईश्वर के समकक्ष स्थान दिया गया है।

माँ को रचना में केवल जननी नहीं, बल्कि प्रथम शिल्पकार और जीवन की पहली गुरु के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वह बच्चों को संस्कारों से तराशकर समाज और राष्ट्र की मजबूत नींव तैयार करती है, अच्छाई और बुराई का अंतर सिखाती है और जीवन की दिशा निर्धारित करती है।

बदलते सामाजिक परिवेश में माँ की भूमिका में आए बदलावों को भी रचना में बखूबी उकेरा गया है। संयुक्त परिवारों से एकल परिवारों तक के बदलाव ने मातृत्व के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी की हैं। आधुनिकता ने जहाँ सुविधाएँ बढ़ाई हैं, वहीं भावनात्मक दूरियाँ भी बढ़ाई हैं। आज की माँ घर और बाहर दोनों जिम्मेदारियों को निभाते हुए बच्चों को प्रतिस्पर्धा के युग में आगे बढ़ाने का दायित्व भी निभा रही है।

रचना समाज की उस सच्चाई को भी सामने लाती है, जहाँ कुछ स्थानों पर माँ वृद्धाश्रमों या सड़कों के किनारे अपने बच्चों की प्रतीक्षा करती दिखाई देती है। समय की कठोर परिस्थितियों के बावजूद माँ की ममता निरंतर बहती रहती है।

ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से भी मातृत्व की महानता को रेखांकित किया गया है। लेखिका ने माई भागो, माता गुजरी, रानी लक्ष्मीबाई, पन्नाधाय, जीजाबाई और अहिल्याबाई होल्कर जैसी महान विभूतियों का उल्लेख करते हुए बताया है कि किस प्रकार माताओं ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए अपने व्यक्तिगत सुखों का त्याग किया।

मूल रचना : माँ – रूह से रूह तक

मनुष्य के जीवन में यदि कोई सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखता है, तो वह है—माँ, जिसके बिना इस सृष्टि की कल्पना भी असंभव है। केवल एक अक्षर का ‘माँ’ शब्द अपने भीतर पूरा ब्रह्मांड समेटे हुए है। उसके तप, त्याग, अर्पण और समर्पण की ऊष्मा में पवित्र भावनाओं का निरंतर प्रवाह होता है।

वह अपने अथक प्रयासों से ईंट-पत्थरों के मकान को स्नेह, संस्कार और सुरक्षा की नींव से सींचकर घर बनाती है। अपने भीतर धड़कती नन्हीं धड़कनों की हलचल के अहसास में उन्मादित, वह सृष्टि को विस्तार देने के उद्देश्य से स्वयं को सीमित करती जाती है।

वह अपने सपनों को धरातल पर उतारकर उन्हें आसमान की ऊँचाइयाँ देने का संकल्प लेती है। न जाने किस दिव्य शक्ति का उसमें संचार हो जाता है कि वह संतान के अलावा कुछ और सोच ही नहीं पाती। उनके हितों को सर्वोपरि रखते हुए वह ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को सहजता से जीती है।

“माँ – रूह से रूह तक” केवल मातृत्व का गुणगान नहीं, बल्कि उस अदृश्य, अनंत और आत्मिक संबंध की खोज है, जो शरीर, समय और परिस्थितियों से परे जाकर आत्मा से आत्मा को जोड़ता है।

यह उस यात्रा का लेखा-जोखा है, जिसमें एक स्त्री जब औरत से माँ बनती है, तो वह त्याग की प्रतिमूर्ति बन जाती है—धरती की तरह ऊपर से कठोर, किंतु भीतर से ममता की नमी से भुरभुरी और संवेदनशील।

मोह-ममता में डूबी वह अपने भीतर के भुरभुरेपन को धीरे-धीरे खोखला करती जाती है। बच्चों के हितों का ध्यान रखते-रखते माँ का त्याग इतना बढ़ जाता है कि वह अपने लिए सोचना ही भूल जाती है। यही कारण है कि माँ को ईश्वर तुल्य दर्जा दिया जाता है।

माँ का अस्तित्व ईश्वरीय बोध है, जिसे शब्दों में परिभाषित करना लगभग असंभव है। वह केवल जननी ही नहीं, बल्कि प्रथम शिल्पकार भी है, जो अपने संस्कारों से बच्चों के व्यक्तित्व को गढ़ती है और समाज व राष्ट्र के भविष्य की मजबूत नींव रखती है।

समाज के बदलते परिवेश में माँ की भूमिका भी बदली है। संयुक्त परिवारों से एकल परिवारों तक की यात्रा ने मातृत्व के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी की हैं। आधुनिकता ने सुविधाएँ दी हैं, लेकिन संवेदनाओं की दूरी भी बढ़ाई है।

आज की माँ केवल बच्चों को जन्म नहीं देती, बल्कि उन्हें प्रतिस्पर्धा के दौर में आगे बढ़ाने का दायित्व भी निभाती है। वह घर और कार्यक्षेत्र के बीच संतुलन स्थापित करते हुए अपने स्वाभिमान और परिवार के बीच सामंजस्य बनाती है।

किन्तु इसी समाज में कहीं वह वृद्धाश्रमों या सड़कों के किनारे बैठी अपने बच्चों की प्रतीक्षा करती दिखाई देती है। समय की कठोरता के बावजूद उसकी ममता निरंतर बहती रहती है।

इतिहास साक्षी है कि अनेक माताओं ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए अपनी संतानों का बलिदान दिया। माई भागो, माता गुजरी, रानी लक्ष्मीबाई, पन्नाधाय, जीजाबाई और अहिल्याबाई होल्कर जैसी महान माताएँ इसके उदाहरण हैं।

माँ निर्झर-सी नीर है, समर्पण में निर्मल क्षीर है। संतान की फिक्र में अधीर, मुसीबतों में धीर-गंभीर है। गर्म लू के थपेड़ों में शीतल समीर, परिवार हेतु पीर-फकीर है।

माँ नदिया-सी अविरल, सब्र-संतोष का तीर है। खुदा का अनुपम नजराना, माँ सचमुच बेजोड़ और बेनजीर है।

माँ सागर की अथाह गहराई है, जिसकी झील-सी आँखों में केवल परिवार की चिंता और बच्चों के सपनों का आकाश बसता है। उसकी थकान, उसका मौन, उसका भीतर-ही-भीतर टूटना और फिर भी मुस्कराते रहना—यही माँ का सच्चा स्वरूप है।

“माँ – रूह से रूह तक” एक ऐसी भावनात्मक और विचारोत्तेजक रचना है, जो मातृत्व के वास्तविक अर्थ, उसकी गहराई और उसके त्याग को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। यह रचना पाठकों के मन में माँ के प्रति सम्मान और संवेदना को और गहरा कर देती है।

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