Tranding
Friday, April 24, 2026

News Desk / News Delhi /April 24, 2026

बढ़ती महंगाई केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह एक आम आदमी के उन सपनों को भी निगल जाती है जो वह बरसों से संजोता है। साहित्यकार डॉ. मधुकांत की लघुकथा 'चांदी' इसी कड़वी सच्चाई को बयां करती है।

कला-साहित्य / आसमान छूते चांदी के भाव ने तोड़ा पिता का सपना: डॉ. मधुकांत की मार्मिक लघुकथा 'चांदी'

कहानी : चांदी

रमुवा की बेटी 'चांदी' अब जवान हो चुकी थी। रमुवा के दिल में सालों से एक ही हसरत थी—अपनी बेटी के ब्याह के लिए कम से कम चांदी का एक मंगलसूत्र बनवाना। एक दिन वह गहरी सांस लेकर अपनी पत्नी से बोला, "चांदी की मां, बहुत इच्छा थी कि बेटी के लिए चांदी का मंगलसूत्र बनवा लूं।"

पत्नी ने हैरानी से पूछा, "कल आप सुनार के पास लेने तो गए थे, फिर क्या हुआ?"

रमुवा ने लाचारी भरे स्वर में जवाब दिया, "लगता है मंगलसूत्र उसकी किस्मत में ही नहीं है। हर साल पाई-पाई जोड़कर सुनार के पास जाता हूं, लेकिन चांदी के दाम मेरी बचत से कहीं ज्यादा तेज रफ्तार से बढ़ जाते हैं। आज गया तो पता चला कि भाव तीन गुना हो गए हैं। समझ नहीं आता क्या करें?"

इस निराशा के बीच चांदी की मां ने ढांढस बंधाते हुए कहा, "चिंता मत करो! अगर असली चांदी का नहीं बन पाया, तो 'गिल्ट' (नकली चांदी) का ले लेंगे। मंगलसूत्र की वजह से बेटी का ब्याह नहीं रुक जाएगा। अब फिक्र छोड़ो और खाना खा लो।"

Subscribe

Trending

24 Jobraa Times

भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को बनाये रखने व लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए सवंत्रता, समानता, बन्धुत्व व न्याय की निष्पक्ष पत्रकारिता l

Subscribe to Stay Connected

2025 © 24 JOBRAA - TIMES MEDIA & COMMUNICATION PVT. LTD. All Rights Reserved.