सिंघानिया परिवार के लिए कश्मीर केवल पर्यटन स्थल नहीं था, बल्कि भावनाओं का संसार था। शहरों की भागदौड़ और कंक्रीट के जंगलों से दूर डल झील के किनारे स्थित उनका फार्म हाउस आत्मिक शांति का प्रतीक था। अप्रैल में जब देश के अधिकांश हिस्से गर्मी से तपने लगते हैं, तब कश्मीर की वादियों में वसंत अपने पूरे यौवन पर होता है।
इस बार वरुण सिंघानिया अकेला कश्मीर आया था। व्यापारिक दृष्टि से कुशल होने के साथ-साथ वह संवेदनशील हृदय वाला कवि भी था। उसका मन अदालतों और कारोबारी मामलों में कम, पहाड़ियों के बीच छिपी उन यादों में अधिक उलझा था, जहाँ उसका बचपन कात्या के साथ बीता था।
कात्या… जिसकी सुंदरता की तुलना अक्सर निशात बाग के खिले फूलों से की जाती थी। उसकी आँखों में डल झील जैसी गहराई और शांति थी। जब भी वरुण और कात्या मिलते, मानो समय ठहर जाता।
उस दोपहर दोनों पहलगाम की ओर निकले। लिद्दर नदी पत्थरों से टकराकर मधुर संगीत उत्पन्न कर रही थी। एक विशाल चिनार के नीचे वरुण ने दरी बिछाई। चारों ओर जंगली फूलों की रंगीन चादर फैली हुई थी।
वरुण ने कात्या का हाथ थामते हुए भावुक स्वर में कहा,
“कात्या, क्या तुम्हें नहीं लगता कि ये वादियाँ हमसे कुछ कहना चाहती हैं? यह नदी जैसे समंदर से मिलने को बेचैन है, वैसे ही मेरा मन हर साल तुम्हारे पास आने को व्याकुल रहता है।”
कात्या हल्का मुस्कुराई, लेकिन उसकी मुस्कान में अनकही उदासी थी। उसने धीमे स्वर में कहा,
“वरुण साहब, पहाड़ जितने खूबसूरत दिखते हैं, उनके सीने में उतने ही गहरे राज दफन हैं। यहाँ की हवा कभी अपनों की खुशबू लाती है, तो कभी बारूद का धुआँ।”
वरुण ने उसकी बात काटते हुए जेब से मखमली डिब्बी निकाली। उसमें लाल सुर्ख सिंदूर था।
उसकी आवाज़ भावनाओं से भर उठी—
“यह सिंदूर सिर्फ एक रंग नहीं, मेरा वादा है। अगली बार मैं तुम्हें हमेशा के लिए अपने साथ ले जाऊँगा। अगर जन्म-जन्मांतर भी लेने पड़े, तब भी तुम्हें खोज लूँगा।”
कात्या की आँखें नम हो उठीं। उसने वरुण के कंधे पर सिर रखते हुए कहा,
“अगर कभी ये वादियाँ हमें जुदा कर दें तो?”
वरुण ने उसके माथे को चूमते हुए कहा,
“मौत हमें शरीर से अलग कर सकती है, रूह से नहीं। अगर मैं न रहा, तो मेरी यादें इन चिनारों की हवाओं में बहेंगी।”
दोनों प्रेम में डूबे थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि झाड़ियों के पीछे नफरत से भरी निगाहें उनकी हर बात सुन रही थीं।
अचानक जंगल में सन्नाटा छा गया। इससे पहले कि वरुण कुछ समझ पाता, दो नकाबपोश आतंकवादियों ने उन्हें घेर लिया। उनके सरगना बिलाल ने एके-47 वरुण की ठुड्डी पर रखते हुए कहा,
“बड़ा गहरा इश्क है काफिर का।”
वरुण तनिक भी विचलित नहीं हुआ। उसने कात्या को अपने पीछे करते हुए कहा,
“जो चाहिए ले लो, लेकिन इसे छोड़ दो। यह निर्दोष है।”
कात्या ने कांपते हुए हाथ जोड़ लिए।
“इन्हें छोड़ दो… ये मेरे शौहर हैं। हम निकाह कर चुके हैं।”
लेकिन बिलाल ने वरुण का पहचान पत्र देखते ही क्रूर हँसी हँसते हुए कहा,
“वरुण सिंघानिया… यही नाम काफी है मौत का फरमान सुनाने के लिए।”
वरुण ने अंतिम बार कात्या की ओर देखा। उस नज़र में भय नहीं, केवल प्रेम और विदाई थी।
“कात्या… हारना मत।”
अगले ही क्षण गोलियों की आवाज़ घाटी में गूंज उठी।
तीन गोलियों ने वरुण के सीने को छलनी कर दिया। चिनार के पत्तों पर खून के छींटे ऐसे बिखरे मानो प्रकृति स्वयं रो पड़ी हो। वरुण का निर्जीव शरीर कात्या की गोद में गिर पड़ा। उसका सफेद कुर्ता रक्त से लाल हो चुका था।
बिलाल कात्या को जबरन अपने गुप्त ठिकाने ‘गुफा-7’ ले गया। वह स्थान अंधकार, सीलन और मौत की गंध से भरा था। वहाँ कात्या को नया नाम दिया गया—‘गनीमत’।
बिलाल ने जबरन उससे निकाह किया, लेकिन वह उसके शरीर को कैद कर सका, आत्मा को नहीं। हर रात कात्या को वरुण की अंतिम मुस्कान याद आती। उसने रोना छोड़ दिया था। उसकी आँखों में अब केवल प्रतिशोध की ज्वाला थी।
धीरे-धीरे उसने आतंकवादियों की योजनाओं पर नज़र रखनी शुरू की। उसे पता चला कि वे भारतीय सेना के बड़े सैन्य डिपो को उड़ाने की साजिश रच रहे हैं। गुफा में भारी मात्रा में आरडीएक्स और हथियार जमा किए गए थे।
कात्या ने अपनी चुप्पी को हथियार बना लिया। उसने आतंकवादियों का विश्वास जीतने का नाटक किया और सही अवसर की प्रतीक्षा करने लगी।
एक रात बिलाल और उसके साथी जश्न में डूबे हुए थे। भारी नशे की हालत में सब बेखबर पड़े थे। उसी दौरान कात्या ने उसका सैटेलाइट फोन उठाया और भारतीय सेना के इमरजेंसी नेटवर्क से संपर्क किया।
उसने अपना कोडनेम बताया—
“सिंदूर।”
सेना मुख्यालय में तैनात मेजर विक्रम इस सूचना से चौंक उठे। घाटी के भीतर से इतनी सटीक जानकारी मिलना असाधारण था।
कात्या ने धीमे स्वर में कहा,
“साहब, यहाँ इतना बारूद है कि पूरी पहाड़ी उड़ सकती है। वे हजारों बेगुनाहों की जान लेने वाले हैं। आप हमला कीजिए… मेरी चिंता मत कीजिए।”
मेजर विक्रम ने पूछा,
“हमें आपकी लोकेशन कैसे मिलेगी?”
कात्या का उत्तर था—
“जब आसमान में आग का गोला दिखाई दे, समझ लीजिए वही रास्ता है।”
भारतीय सेना ने तुरंत ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की योजना बनाई। लक्ष्य था उस बंकर को नष्ट करना, जहाँ भारी मात्रा में विस्फोटक जमा था। वह स्थान इतना दुर्गम था कि हवाई हमला संभव नहीं था और जमीनी सेना के पहुँचने से पहले आतंकवादी बड़ा नरसंहार कर सकते थे।
वह रात अंतिम थी।
कात्या ने अपने फेरन में छिपाकर रखी सिंदूर की डिब्बी निकाली और अपनी मांग भरी। आज वह किसी आतंकवादी की कैदी नहीं, बल्कि वरुण सिंघानिया के प्रेम और भारत माता की अस्मिता का प्रतीक थी।
उसने विस्फोटकों से भरी बेल्ट अपने शरीर से बाँधी और मुख्य हॉल की ओर बढ़ गई, जहाँ बिलाल अपने साथियों के साथ अंतिम योजना बना रहा था।
बिलाल ने उसे देखकर कहा,
“आज तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो कात्या।”
कात्या के चेहरे पर अद्भुत तेज था। उसने दृढ़ स्वर में कहा,
“आज मेरा श्रृंगार पूरा हुआ है… और इसकी कीमत तुम्हें अपनी जान देकर चुकानी होगी।”
इतना कहते ही उसने जोरदार स्वर में नारा लगाया—
“जय हिंद!”
और अगले ही पल ट्रिगर दबा दिया।
भीषण विस्फोट से पूरी घाटी कांप उठी। गुफा और उसमें छिपा आतंक का साम्राज्य मलबे में बदल गया। आतंकवादियों का अस्तित्व समाप्त हो चुका था। कात्या का शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया, लेकिन उसका बलिदान अमर हो गया।
अगली सुबह भारतीय सेना जब वहाँ पहुँची, तो चारों ओर केवल राख और मलबा था। मेजर विक्रम को उसी मलबे के बीच एक जली हुई सिंदूर की डिब्बी मिली। उन्होंने उसे उठाकर अपने माथे से लगाया और श्रद्धा से नमन किया।
आज भी पहलगाम की हवाएँ जब चिनार के पेड़ों से टकराती हैं, तो ऐसा लगता है मानो वरुण और कात्या की प्रेम कथा फिजाओं में गूंज रही हो। लोग कहते हैं कि उस घाटी की मिट्टी में आज भी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बलिदान की सुगंध बसती है।