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Tuesday, March 10, 2026

News Desk / News Delhi /March 10, 2026

पानी की बढ़ती कमी और पर्यावरण संकट के दौर में रोहतक के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मधुकांत की कविता "जल गीत" समाज को जल के महत्व का सशक्त संदेश देती नजर आती है। लोकधुन की लय और सहज शब्दों में रची यह कविता केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति ही नहीं, बल्कि जल संरक्षण के प्रति जागरूकता का प्रभावी आह्वान भी है।

कला-साहित्य / साहित्यकार डॉ. मधुकांत का ‘जल गीत’ बना जल संरक्षण का संदेशवाहक

कविता: जल गीत

ताक धिना धिन
धीना धीन, ताक धिना धिन
प्राणी प्यासा, व्यर्थ है सोना
जल ही है जीवन।।

व्यर्थ करो ना एक बूंद भी
है यही हमारा कल
ताल तलैया, नदिया सागर
है जल में नवजीवन
जल से होता सब निर्मल
जल……………

जीवन जल से, खेती जल से
धरती प्यासी जिंदा जल से
हरियाली सारी है जल से
सब कुछ बसता है जल में
है जल ही नवजीवन
जल………

जीव-जंतु, पक्षी सब जल से
छाए जब घनघोर घटाएं
बादल करता अमृत वर्षा
जल से है बादल
बस यही हमारा कल…

प्राणी प्यासा, व्यर्थ है सोना
जल ही है जीवन।।

कविता की शुरुआत लोकगीत की मधुर ताल “ताक धिना धिन, धीना धीन” से होती है, जो पाठक और श्रोता को तुरंत अपनी ओर आकर्षित करती है। इसके माध्यम से कवि एक गहरी सच्चाई सामने रखते हैं— यदि जल नहीं, तो जीवन भी नहीं।

डॉ. मधुकांत अपनी इस रचना में बताते हैं कि सोना-चांदी जैसी भौतिक संपत्ति भी उस समय निरर्थक हो जाती है जब जीवनदायिनी जल की बूंद उपलब्ध न हो। वे चेतावनी देते हैं कि जल की एक भी बूंद व्यर्थ नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यही हमारे वर्तमान और भविष्य दोनों की आधारशिला है।

कविता में तालाब, तलैया, नदियों और समुद्र का उल्लेख करते हुए कवि प्रकृति के उस चक्र को रेखांकित करते हैं, जिसके केंद्र में जल ही है। खेती की हरियाली, धरती की जीवंतता और समूचे पर्यावरण की पवित्रता जल पर ही निर्भर है। मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी और समस्त जीव-जंतु भी जल से ही जीवन पाते हैं।

जब आकाश में घनघोर बादल छाते हैं और वर्षा की बूंदें धरती पर गिरती हैं, तब प्रकृति मानो अमृत बरसाती है। यही अमृत धरती को जीवन देता है और प्रकृति को फिर से हरा-भरा बना देता है।

इस प्रकार की साहित्यिक रचनाएँ समाज में जागरूकता फैलाने का सशक्त माध्यम बनती हैं। आज जब जल संकट वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है, तब *“जल गीत”* जैसी रचनाएँ लोगों को पानी बचाने और उसके महत्व को समझने के लिए प्रेरित करती हैं।

डॉ. मधुकांत की यह रचना स्पष्ट संदेश देती है कि जल की हर बूंद अनमोल है। यदि हम आज जल को बचाने के लिए जागरूक नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का आधार ही संकट में पड़ सकता है। इसलिए जल संरक्षण केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मानवता के भविष्य की सुरक्षा का संकल्प भी है।

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