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Thursday, July 16, 2026

News Desk / News Delhi /July 16, 2026

एक देश, जो अपनी "माँओं" की पूजा तो करता है, लेकिन उनकी पुकार सुनना भूल जाता है


भारत की आत्मा कुछ शब्दों में बसती है।
माँ।

यह शब्द हमारे लिए केवल एक संबोधन नहीं है। यह श्रद्धा है, भावना है, संबंध है।
हम धरती को धरती माँ कहते हैं।
गाय को गौमाता कहते हैं।
नदियों को जीवनदायिनी माँ का दर्जा देते हैं।
और गंगा..
गंगा तो हमारे लिए केवल नदी नहीं, गंगा मैया है।
करोड़ों भारतीयों के लिए गंगा आस्था, संस्कृति और सभ्यता की धारा है। जन्म से मृत्यु तक, जीवन के हर महत्वपूर्ण पड़ाव पर गंगा किसी न किसी रूप में हमारे साथ रहती है।


लेकिन इतिहास कभी-कभी हमसे एक असहज प्रश्न पूछता है—

क्या किसी को माँ कह देना ही उसके प्रति हमारा कर्तव्य पूरा कर देता है?

या माँ होने का सम्मान उसके संरक्षण, उसकी देखभाल और उसके दर्द को समझने में दिखाई देता है?

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देश / अंतिम उपवास की सत्य कथा: जी.डी. अग्रवाल से सोनम वांगचुक तक एक चेतावनी | समाज और व्यवस्था से एक असहज सवाल - संजय सक्सैना

देश में गाय को 'माँ' कहने की संस्कृति भी है और दुनिया के बड़े बीफ मांस निर्यातकों में भारत की गिनती भी होती रही है। यह विरोधाभास लोगों को सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी आस्था और हमारी नीतियाँ हमेशा एक-दूसरे के अनुरूप होती हैं।


ठीक यही सवाल गंगा के सामने भी खड़ा है। जिस नदी के जल को करोड़ों लोग पवित्र मानते हैं, वही नदी दशकों तक प्रदूषण, अविरल प्रवाह में बाधाओं और अतिक्रमण जैसी समस्याओं से जूझती रही।

यदि केवल "माँ" कहना ही पर्याप्त होता, तो शायद एक 86 वर्षीय वैज्ञानिक को अपनी अंतिम साँसों तक गंगा के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता।

उस वैज्ञानिक का नाम था -
प्रोफेसर जी. डी. अग्रवाल।

वह वैज्ञानिक जिसने गंगा के लिए अपना जीवन दे दिया


जी. डी. अग्रवाल केवल एक आंदोलनकारी नहीं थे।
वे पहले एक वैज्ञानिक थे।

20 जुलाई 1932 को जन्मे गुरुदास अग्रवाल ने इंजीनियरिंग की शिक्षा उस समय के यूनिवर्सिटी ऑफ रुड़की से प्राप्त की, जो आज भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के नाम से जाना जाता है।


उन्होंने अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले से उच्च शिक्षा प्राप्त की और पर्यावरण इंजीनियरिंग के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल की।


उनके पास ज्ञान था, प्रतिष्ठा थी और एक आरामदायक जीवन जीने के सभी अवसर थे। लेकिन उन्होंने अपना जीवन केवल व्यक्तिगत सफलता के लिए नहीं चुना। उन्होंने भारत लौटकर शिक्षा, शोध और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम किया। वे आईआईटी कानपुर से जुड़े और देश की नई पीढ़ी के इंजीनियरों को तैयार किया।


भारत में प्रदूषण नियंत्रण की संस्थागत व्यवस्था विकसित होने के समय उन्होंने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निर्माण और कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।



उनकी सोच स्पष्ट थी—

विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो प्रकृति को नष्ट कर दे, वह भविष्य के लिए खतरा है।

गंगा उनके लिए केवल धार्मिक भावना नहीं थी।


वह विज्ञान का विषय भी थी।


वह जानते थे कि नदी केवल बहता हुआ पानी नहीं होती।


एक नदी अपने साथ पूरा जीवन तंत्र लेकर चलती है।


उसके किनारे बसे गाँव।


उस पर निर्भर किसान।


उसमें रहने वाले जीव।


उससे जुड़ा पर्यावरण।


जब नदी कमजोर होती है, तो केवल पानी नहीं बदलता—पूरी सभ्यता प्रभावित होती है।


जी. डी. अग्रवाल ने वर्षों तक चेतावनी दी।


उन्होंने सरकारों को लिखा।


उन्होंने वैज्ञानिक तर्क दिए।


उन्होंने समझाया कि गंगा को बचाने के लिए केवल सफाई अभियान पर्याप्त नहीं है, नदी की प्राकृतिक धारा को भी सुरक्षित रखना होगा।


लेकिन अक्सर व्यवस्था में समस्या यह नहीं होती कि उसे जानकारी नहीं होती।


समस्या यह होती है कि वह जानकारी को गंभीरता से कब लेती है।


2008 में जी. डी. अग्रवाल ने एक ऐसा निर्णय लिया जिसने पूरे देश को चौंका दिया।


उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद बन गए।


यह किसी प्रसिद्धि की तलाश नहीं थी।


यह एक वैज्ञानिक का अंतिम संघर्ष था।


उन्होंने गंगा की रक्षा के लिए अनशन किए।


का संघर्ष उत्तराखंड की जलविद्युत परियोजनाओं और गंगा की अविरलता से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित था।


उनके 2009 के आंदोलन के बाद लोहरीनाग पाला जलविद्युत परियोजना को रोकने का निर्णय लिया गया।


लेकिन उनका मानना था कि लड़ाई अभी बाकी है।


क्योंकि समस्या केवल एक परियोजना की नहीं थी।


समस्या उस सोच की थी जिसमें प्रकृति को केवल उपयोग की वस्तु समझा जाता है।


एक देश जो सुनता कम और शोर ज्यादा करता है


इसी बीच भारत बदल रहा था।


मोबाइल फोन ने दुनिया को हथेली में ला दिया।


सोशल मीडिया ने प्रसिद्धि के नए रास्ते खोल दिए।


कुछ सेकंड के वीडियो करोड़ों लोगों तक पहुँचने लगे।


यह तकनीक बुरी नहीं थी।


मनोरंजन, कला और रचनात्मकता का अपना महत्व है।



लेकिन एक सवाल जरूर खड़ा हुआ—

क्या हमने समाज के वास्तविक योगदानकर्ताओं को उतनी ही गंभीरता से देखना बंद कर दिया है?

क्या एक वायरल चेहरा किसी वैज्ञानिक, शिक्षक, पर्यावरणविद् या समाज सुधारक से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है?

किसी राष्ट्र की पहचान केवल उसके सितारों से नहीं बनती।


उसकी पहचान उन लोगों से बनती है जो बिना तालियों के काम करते हैं।


जो सीमा पर खड़े सैनिक हैं।


जो प्रयोगशाला में शोध करते वैज्ञानिक हैं।


जो स्कूलों में भविष्य तैयार करते शिक्षक हैं।


जो जंगलों और नदियों के लिए संघर्ष करते पर्यावरण कार्यकर्ता हैं।


लेकिन कई बार ऐसे लोग तब पहचाने जाते हैं जब वे हमारे बीच नहीं रहते।


लेकिन 2018 में जो हुआ, वह केवल एक अनशन नहीं था। वह एक वैज्ञानिक का अपने ही समाज और व्यवस्था के सामने अंतिम सत्याग्रह था।


86 वर्ष की उम्र में, जब अधिकांश लोग जीवन की थकान के बाद विश्राम चाहते हैं, स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद ने अपनी देह को ही अपनी आखिरी आवाज़ बना दिया। 22 जून 2018 को उन्होंने गंगा की अविरलता और संरक्षण की माँगों को लेकर अनिश्चितकालीन उपवास शुरू किया। उनकी माँगों में गंगा की सुरक्षा के लिए ठोस कानूनी व्यवस्था, नदी की प्राकृतिक धारा को बनाए रखना और ऐसी परियोजनाओं पर पुनर्विचार शामिल था जो उनके अनुसार गंगा के अस्तित्व को प्रभावित कर सकती थीं।


उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखे। उन पत्रों में किसी व्यक्तिगत सम्मान, पद या सुविधा की माँग नहीं थी। एक वैज्ञानिक की चिंता थी—उस नदी के लिए, जिसे करोड़ों लोग माँ कहते हैं। लेकिन दिन गुजरते गए। उनका शरीर कमजोर होता गया और उनकी प्रतीक्षा लंबी होती गई।


धीरे-धीरे उनका अनशन केवल भोजन त्यागने का निर्णय नहीं रहा। वह एक प्रतीक बन गया—एक ऐसे व्यक्ति का प्रतीक जिसने अपने जीवन के अंतिम चरण में यह स्वीकार कर लिया था कि शायद उसकी आवाज़ तब तक नहीं सुनी जाएगी, जब तक उसकी साँसें स्वयं एक प्रश्न न बन जाएँ।


अनशन के अंतिम दिनों में उन्होंने भोजन तो पहले ही त्याग दिया था, और अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले पानी भी छोड़ दिया था। प्रशासन ने उनकी बिगड़ती स्थिति के बाद उन्हें ऋषिकेश स्थित एम्स ले जाया, लेकिन 111 दिनों तक चले इस संघर्ष के बाद 11 अक्टूबर 2018 को उनका निधन हो गया।


उनकी अंतिम लड़ाई हमें एक गहरा प्रश्न देकर गई—



जिस नदी को हम "माँ" कहते हैं, क्या उसकी पीड़ा सुनने के लिए एक माँ के बेटे को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़नी चाहिए?

एक वैज्ञानिक चला गया।


एक शिक्षक चला गया।


एक ऐसा व्यक्ति चला गया जिसने अपनी अंतिम साँस तक एक नदी के लिए संघर्ष किया।


कुछ दिनों तक चर्चा हुई।


श्रद्धांजलियाँ दी गईं।


फिर देश अपनी गति से आगे बढ़ गया।


लेकिन गंगा का प्रश्न वहीं रहा।


अब हिमालय से आती है एक और आवाज़


समय बदला।


लेकिन सवाल वही रहा।


और फिर हिमालय से एक आवाज़ उठी।


सोनम वांगचुक।


लद्दाख के इस शिक्षक, नवाचारकर्ता और पर्यावरण कार्यकर्ता ने वर्षों से शिक्षा, जल संरक्षण और हिमालयी पर्यावरण के मुद्दों पर काम किया है।


उन्होंने दिखाया कि समाधान केवल बड़े शहरों की प्रयोगशालाओं में नहीं होते।


कभी-कभी समाधान पहाड़ों, गाँवों और स्थानीय ज्ञान में भी छिपे होते हैं।


उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे प्रयोग किए जिनमें बच्चों को केवल नौकरी के लिए नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति के लिए तैयार करने पर जोर दिया गया।


उन्होंने जलवायु परिवर्तन और हिमालयी क्षेत्रों की नाजुक स्थिति को लेकर लगातार चेतावनी दी।


उनकी आवाज़ में वही बेचैनी दिखाई देती है जो कभी जी. डी. अग्रवाल की आवाज़ में थी।


एक सवाल—
क्या हम प्रकृति के संकट को तब तक अनदेखा करते रहेंगे, जब तक वह हमारे दरवाजे तक नहीं आ जाता?


बहरी व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या


व्यवस्था हमेशा बुरी नहीं होती।


लेकिन कोई भी व्यवस्था तब कमजोर हो जाती है जब वह चेतावनियों को सुनना बंद कर देती है।


बहरा होना केवल कानों से नहीं होता।


कभी-कभी सत्ता, समाज और संस्थाएँ आँखें खुली रखते हुए भी बहरी हो जाती हैं।


जी. डी. अग्रवाल की आवाज़ सुनी गई, लेकिन देर से।


सोनम वांगचुक की आवाज़ सुनी जा रही है, लेकिन क्या समय रहते समझी जाएगी?


यही असली प्रश्न है।


क्योंकि इतिहास बार-बार हमें बताता है—


महान लोग अचानक पैदा नहीं होते।


वे हमारे बीच होते हैं।


वे बोलते हैं।


वे चेताते हैं।


वे संघर्ष करते हैं।


लेकिन हम अक्सर उन्हें तब पहचानते हैं जब वे केवल किताबों का हिस्सा बन चुके होते हैं।


शायद इस कहानी का सबसे दर्दनाक सच यही है—


हम अपने नायकों को मारते नहीं हैं।

हम उन्हें अनदेखा करते हैं।

हम उनकी आवाज़ को शोर में दबा देते हैं।

हम उनकी चिंता को "बहस" बना देते हैं।

और जब वे चले जाते हैं, तो उनकी तस्वीरों पर फूल चढ़ाकर संतोष कर लेते हैं।

गंगा आज भी बह रही है।


हिमालय आज भी खड़ा है।


लेकिन दोनों हमें एक ही सवाल पूछ रहे हैं—


क्या हमें केवल माँ कहने की आदत है, या माँ की रक्षा करने का साहस भी है?


क्योंकि किसी देश की महानता इस बात से तय नहीं होती कि वह अपने महान लोगों की मृत्यु के बाद कितना सम्मान करता है।


महानता इस बात से तय होती है कि वह उन्हें जीवित रहते कितना सुनता है।


और शायद इसी कारण...


हमने सोनम वांगचुक को बहुत पहले मार दिया था।



क्योंकि किसी व्यक्ति की पहली मृत्यु शरीर की नहीं होती।

उसकी पहली मृत्यु तब होती है...

जब समाज उसकी आवाज़ सुनना बंद कर देता है।

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